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लोकनायक जयप्रकाश नारायण

लोकनायक जयप्रकाश नारायण सच्चे अर्थों में लोक, अर्थात जनता के नायक थे। वे भारतमाता के उन वीर सपूतों में से एक थे, जिन्होंने मानवीय मूल्यों और मानवता के प्रति निरन्तर संघर्ष किया। समाजवादी लोक कल्याणकारी राज्य एवं समाज की कल्पना को साकार करने में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो। 1999 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ भी उनके नाम पर है।

लोकनायक जयप्रकाश जी की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को भी एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े। जैसे – भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन। वे विदेशी सत्ता से देशी सत्ता, देशी सत्ता से व्यवस्था, व्यवस्था से व्यक्ति में परिवर्तन और व्यक्ति में परिवर्तन से नैतिकता के पक्षधर थे।

जे०पी० समाजवादी, सर्वोदयी तथा लोकतांत्रिक जीवन पद्धति के समर्थक थे। उनके अनुसार समाजवाद एक जीवन पद्धति है, जो मानव की स्वतंत्रता, समानता, बन्धुत्व तथा सर्वोदय की समर्थक है। समाजवाद आर्थिक तथा सामाजिक पुनर्निमाण की पूर्ण विचारधारा है, जिसके सुनियोजित सिद्धान्त के तहत सम्पूर्ण समाज का सन्तुलित विकास होना चाहिए। विभिन्न गुणों से सम्पन्न मनुष्य को इसमें शोषण, भुखमरी तथा दरिद्रता से मुक्ति दिलानी है।

समाजवाद के पथ में किसी तानाशाह की भूमिका उन्हें स्वीकार नहीं थी। समाजवाद में भूमि कर की समाप्ति, गांवों का विकास, राष्ट्रीयकरण, भू-दान, सम्पत्ति दान, ग्राम दान, आर्थिक, सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा तथा सर्वोदय शामिल हैं। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के वे आलोचक थे।

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